Soul Of Rythms

A musical journey…

उत्तरी और दक्षिणी ताल पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन

उत्तरी और दक्षिणी ताल पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन

उत्तरी और दक्षिणी ताल पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन करना एक कठिन कार्य है फिर भी हम इस विषय को सरल भाषा में जानने का प्रयत्न करेंगे | भारतीय संगीत में ताल को लिपिबद्ध करने के लिए २ प्रकार की ताल लिपि पध्तियों का निर्माण हुआ है | भारत के दक्षिणी भाग (मद्रास,मैसूर,त्रिवेंद्र्म,आदि) में प्रचलित ताल लिपि को कर्नाटकी या दक्षिणी ताल लिपि पद्धति कहा जाता है तथा भारत के उत्तरी भाग में प्रचलित ताल लिपि को उत्तरी ताल लिपि कहा जाता है | यह तालपद्धति का तुलनात्मक अध्यन विद्यार्थियों के लिए अति आवश्यक है| इससे ही वह तालों तथा उनके स्वरूप को पहचान सकते हैं |

ताल लिपिओं का यह विभाजन १३वीं शताब्दी के बाद हुआ | मुग़ल सल्तनत के भारत में अपने संगीत को विस्तार देने के कारण अमीर खुसरो के आगमन के साथ एक नवीन ताल लिपि का निर्माण हुआ |

उत्तरी ताल लिपि पद्धति – इस ताल लिपि में ताल रचना के लिए मात्रा की गिनती, विभागीय बाँट, खाली का स्थान, बोलो का चयन, वादन शैली, लय आदि का प्रयोग किया जाता है |

  • मात्रा की गिनती – ताल की रचना के समय यह निश्चित किया जाता है कि यह ताल कितने मात्रा काल का होगा | यह मात्रा संख्या ताल में प्रयोग होने वाले बोलों के आधार पर की जाती है | जैसे: रूपक के लिए ७ मात्रा, एक ताल के लिए १२ मात्रा, आदि | इस ताल लिपि में मात्रा के आधे, पौने तथा सवाए हिस्से का भी प्रयोग किया जाता है |
  • विभागीय बाँट – मात्राओं के तय होने के बाद ताल के विभागों की संख्या निश्चित की जाती है | उत्तरी ताल लिपि में २ से ६ विभाग तक मिलते हैं | आवश्यकता अनुसार विभागों की संख्या को बदलकर नवीन तालों का निर्माण भी किया जाता है |
  • खाली का स्थान – सम का स्थान स्पष्ट करने के लिए ताल में खाली का स्थान भी निश्चित किया जाता है | किसी भी ताल में २ ताली तो साथ-साथ हो सकती है परन्तु खाली २ नहीं हो सकती | खाली के प्रयोग से ताल के स्थान का सही-सही अनुमान लगाया जा सकता है |
  • बोलो का चयन – बोलो का चयन ताल के प्रयोग के आधार पर किया जाता है | गंभीर शैली की संगत के लिए ताल की प्रक्रति भी गंभीर होनी चाहिए | सुगम संगीत, भजन, ग़ज़ल जैसी संगीत शैलियों में चंचल प्रक्रति की तालों का प्रयोग होता है |
  • वादन शैली – ताल की वादन शैली भी उसके प्रयोग पर आधारित होती है | जैसे ध्रुपद,ख्याल जैसी गायन शैली में विलंबित तीन ताल, विलंबित एक ताल, झूमर जैसी तालों का प्रयोग होता है तथा सुगम संगीत, भजन,गज़ल आदि में दादरा, कहरवा, दीपचंदी जैसी चंचल प्रक्रति की तालों का प्रयोग होता है |
  • लय – उत्तर भारतीय संगीत में विभिन्न गायन शैलीयों के साथ अलग-अलग लय में तालों का वादन होता है | इस लय के बदलाव के कारण ही कई तालों का निर्माण हुआ है | आने वाले समय में भी यह बदलाव होते रहेंगे तथा कई नावीन रचनायें होती रहेंगी |

दक्षिणी ताल लिपि पद्धति – यह ताल लिपि भारत के दक्षिणी भाग में जन्मी तथा विकसित हुई | यह ताल लिपि मुख्य रूप से ७ तालों (ध्रुव, मठ, रूपक, झंप, त्रिपुट/आदि, अठ तथा एक) पर निर्भर है जिस कारण इसे ‘सप्त-तालम’ भी कहा जाता है | इन ७ तालों में लघु की संख्या में बदलाव करके ३५ तालों का सिधांत मन जाता है | इस पद्धति में काल, अंग, जाति तथा विसर्जितम को आधार मानकर ताल का निर्माण किया जाता है |

  • काल – संगीत में जिस समय में गायन, वादन या नृत्य हो रहा हो उसे काल की परिभाषा दी गयी है | इस ताल लिपि में ताल को २ तरीके से नापा जाता है:- १. अक्षरम; २. मात्रा | अक्षरम को छोटी इकाई की तरह माना जाता है तथा मात्रा को बड़ी | ४ अक्षरम से १ मात्रा का निर्मित होती है तथा कुछ मात्राओं के जोड़ से ताल का निर्माण होता है | लघु की गिनती में बदलाव होने से मात्राओं की संख्या बढ़ या घट जाती है |
  • अंग – जिस प्रकार उत्तरी ताल पद्धति में विभाग होते हैं ठीक उसी प्रकार दक्षिणी पद्धति में अंग होते है – ताल के अंग | दक्षिणी ताल पद्धति में ६ अंग माने जाते है- अणुद्रुत, द्रुत, लघु, गुरु, प्लुत, काकपद जिनकी मात्रा संख्या क्रमश: १,२,४,८,१२,१६ है | इनमे से लघु ही केवल ऐसा अंग है जिसकी मात्रा संख्या में बदलाव करके ताल की जाति को बदला जा सकता है | वर्तमान समय में केवल अणुद्रुत, द्रुत तथा लघु का ही प्रयोग देखने मिलता है और गुरु, प्लुत तथा काकपद का प्रयोग नहीं होता |
  • जाति – दक्षिणी पद्धति में लघु की शक्ति में बदलाव करके ताल की जाति को बदला जाता है | इस बदलाव के कारण ही ७ तालें ३५ तालों का रूप धारण करती हैं | वर्तमान समय में ५ जातियां हैं- तिस्र जाति, चतुश्र जाति, खंड जाति, मिश्र जाति तथा संकीर्ण जाति |
  • विसर्जितम – दक्षिणी ताल पद्धति में मात्राओं को निशब्द हस्त क्रिया के द्वारा दर्शाने की विधि को ही विसर्जितम कहा जाता है | जिस प्रकार उत्तरी पद्धति में ताली तथा खाली का स्थान होता है ठीक उसी प्रकार दक्षिणी ताल पद्धति में ताली तथा विसर्जितम प्रयोग होते हैं | इसके तीन प्रकार माने गये हैं – पताक विसर्जितम, कृष्या विसर्जितम तथा सर्पनी विसर्जितम |

 

  • पताक विसर्जितम – इस क्रिया में हाथ को ऊपर की और उठाते हुए मात्रा को गिना जाता है |
  • कृष्या विसर्जितम - इस क्रिया में हाथ को दांए से बांइ तरफ ले जाते हुए मात्रा को गिना जाता है |
  • सर्पनी विसर्जितम - इस क्रिया में हाथ को बांए से दांइ तरफ ले जाते हुए मात्रा को गिना जाता है |

इस प्रकार हम देखते हैं कि यह दोनों ताल पध्तियाँ चाहे एक ही सांगीतिक अदारे का हिस्सा हैं परन्तु फिर भी यह एक दुसरे से काफी अलग हैं | इनका प्रयोग, बनावट, विस्तार, आदि में भिन्नता है | फिर भी यह भारतीय संगीत के एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह जुड़े हुए हैं |

भारतीय संगीत पद्धति वर्तमान समय में पूरे विश्व की सबसे अधिक विकसित तथा सटीक पध्तियाँ हैं | इनके राग, ताल सब भिन्न हैं पर फिर भी कई मायनों में यह एक दुसरे से जुडी हुई हैं | जैसे कि यह दोनों ही सुर, ताल, राग के घेरे में हैं, दोनों ही थाटों का प्रयोग करते हैं |

इनमे कुछ बातें अलग भी है जैसे दक्षिणी ताल पद्धति ३५ तालों के दायरे में रहती है जबकि उत्तरी पद्धति में तालों की संख्या असीमित है, जिसमे मात्रा के सवाए, आधे तथा पौने हिस्से का प्रयोग भी होता है परन्तु दक्षिणी ताल पद्धति में पूर्ण मात्रा ही प्रयोग होती है | दक्षिणी पद्धति में रचना को अधिक महत्व दिया जाता है जबकि उत्तरी पद्धति में सुर विस्तार को अधिक महत्व दिया जाता है |

 

उत्तरी तथा दक्षिणी तालपद्धति का तुलनात्मक अध्ययन और करीब से जानने के लिए हम इस आर्टिकल का सहारा ले सकते हैं - क्लिक करें |

तालपद्धति का तुलनात्मक अध्यन
error: Content is protected !!