तबले के घराने तथा विशिष्टता(Hindi)

तबला घराने तथा विशिष्टता

तबला घराने तथा विशिष्टता, इस विषय में चर्चा आरम्भ करने से पहले ये जानना अति आवश्यक है की “घराना” क्या होता है | इसे हम वंश परम्परा भी कह सकते है | जिस प्रकार वंश आगे बढ़कर घराने का रूप धारण कर लेता है ठीक उसी प्रकार जब एक वादन-शैली, गुरु-शिष्य परम्परा से होती हुई विस्तार करती है तो घराने की शक्ल इख़्तियार कर लेती है | भारतीय संगीत में तबले के कुल छ: घरानों को मान्यता प्राप्त हुई- दिल्ली घराना, अजराडा घराना, लखनऊ घराना, फरुखाबाद घराना, बनारस घराना और पंजाब घराना | ये सभी घराने एक दुसरे से अपनी वादन क्रिया, सबक तथा निकास के आधार पर एक दुसरे से अलग हैं | आइये अब इन घरानों के निर्माण, विकास तथा विशेषताओं पर चर्चा करें |

दिल्ली घराना

इस घराने की नीव उ. सिद्धार खां ढाढी ने रखी | इस गुरु-शिष्य परम्परा को आगे बढाने में इनके शिष्य उ. रोशन खां, उ. कल्लू खां, उ. तुल्लन खां तथा तीन पुत्र उ. बुगरा खां, उ. घसीट खां तथा इनके तीसरे पुत्र का नाम ज्ञात नहीं हो पाया है | उ. सिद्धार खां के इस तीसरे अज्ञात पुत्र के भी तीन पुत्र थे- मक्कू खां, मोदु खां तथा बख्शू खां | जिनका इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण सहयोग है | उ. नाथू खां, उ. काले खां, उ. बोली बक्श, उ.गामी खां, उ. इनाम अली, उ. लतीफ़ अहमद खान, उ. एंथोनी दास, उ. गुरप्रीत सिंह,आदि.. कई योग्य तबला वादक इस घराने ने दिए हैं |

दिल्ली घराने की विशेषता उसका तर्जनी तथा मध्यमा का अधिक प्रयोग है, इसीलिए इसे “किनार का बाज” भी कहा जाता है | पेशकार, कायदा तथा रेलों का इस घराने में अधिक प्रयोग होता है | सोलो वादन के लिए ये बाज उपयुक्त है |

अजराडा घराना

मेरठ ज़िले का एक गावों है अजराडा, वहां के कल्लू खां और मीरू खां जो भाई थे, उन्होंने दिल्ली के उ. सिताब खां से तबले की शिक्षा प्राप्त की और अपने घर वापिस चले गए | जहाँ इन्होने अपने अथक प्रयासों से अनेकों शिष्य तैयार किये और एक नए घराने की नीव रखी जिसे “अजराडा घराना” कहा जाता है | उ. शम्मू खां, उ. चाँद खां, उ. काले खां, उ. हब्बीबुद्दीन खां, आदि... इस घराने के नामवार कलाकारों में शामिल है |

इस घराने की विशेषता है आड़ लय का प्रयोग, इस घराने के कायदों के बोल ज़्यादातर आड़ या डेवडी में होते है | जिससे उनका प्रस्तार या विस्तार करना अधिक कठिन हो जाता है | इस घराने की वादन शैली दिल्ली घराने से मिलती जुलती ही है | सोलो वादन की कला में ये घराना उपयुक्त है |

लखनऊ घराना

यह घराना भी दिल्ली घराने की ही एक शाखा है | जब लखनऊ के नवाब के बुलावे पैर दिल्ली घराने के उ. मोदु खां और उ. बख्शू खां को लखनऊ भेजा गया तो इन्होने वहां अपने भरसक प्रयासों से एक नयी शैली उत्पन्न की जिसे “लखनउ घराना” के नाम से जाना जाता है | वहां की सांगीतिक तथा सामाजिक संस्कृति का प्रभाव इनकी शैली में नवीनता का कारण बनी, जिससे इन्होने नए घराने की नीव रखी | उ. मोहम्मद खां, उ. आबिद हुसैन, उ. वाजिद हुसैन, उ. अफाक हुसैन, पं. हिरेन्द्र गांगुली, आदि.. इस घराने के योग्य कलाकारों में सम्मिलित है |

लखनऊ की संस्कृति पर आरम्भ से ही नृत्य का खासा प्रभाव देखने को मिलता है, जिसका सीधा-सीधा असर वहां के तबला-वादकों पर भी पड़ा | लखनऊ के तबला वादकों के नृत्य के साथ संगत करने के कारण उनकी वादन शैली ज़ोरदार हो गयी | इनकी अधिकतर रचनाओं में किनार तथा स्याही का प्रयोग मिलता है |

फरुखाबाद घराना

यह घराना उस वक्त वजूद में आया जब उ. बख्शू खां ने अपनी पुत्री का विवाह फरुखाबाद के हाजी विलायत अली से की, तथा उन्हें तबले की उच्च शिक्षा भी दी | उसके बाद उन्होंने कई शिष्य तैयार किये तथा एक नए घराने को मान्यता दिलाई | उ. इमाम बक्श, उ. हुसैन अली खां, उ.सलारी खां, उ. मुनीर खां, उ. अहमद जान थिरकवा, उ. अमीर हसन, उ. करामत उल्ला, उ. मसीत खां, उ. सबीर खां, आदि.. इस घराने के कलाकार है |

यह घराना क्यूंकि लखनऊ की शाखा था इसलिए वहां की वादन शैली का आभास इस घराने में भी होता है | इसके अलावा गत, रौ तथा चलन का भी इस घराने में बहुत अधिक प्रयोग होता है |

बनारस घराना

इस घराने के प्रथम तबला-वादक हुए पं. राम सहाय, जिन्होंने लखनऊ के उ. मोदू खां से शिक्षा प्राप्त की और बनारस घराने की नीव डाली | तत्पच्चात इनके पुत्र पं. भैरव सहाय तथा पौत्र पं. बलदेव सहाय तथा पड़पौत्र पं. दुर्गा सहाय ने इस वंश-परंपरा को आगे बढाया | पं. कंठे महाराज, पं. किशन महाराज, पं. अनोखे लाल, पं. बिक्कू जी, पं. समता प्रसाद जी, आदि.. इस घराने के परिचायक हैं |

यह घराना अपनी साथ-संगत के लिए अधिक मशहूर हुआ | इस घराने की वादन शैली में लग्गी, लड़ी, परन, रेला, चक्रदार तथा छंदों को अधिक महत्व दिया जाता है | ठुमरी, न्रत्य तथा सोलो-वादन की दृष्टि से यह घराना उतम है |

पंजाब घराना

यह घराना तबले के बाकी सभी घरानों से अलग है, इसकी वादन-शैली से प्रतीत होता है कि यह स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ है | इस घराने की नीव उ. फ़कीर बक्श ने रखी | उ. करमइलाही, उ. मल्लन खां, उ. कदीर बक्श, उ.अल्लाहरक्खा तथा उनके पुत्र उ. जाकिर हुसैन इस घराने के विश्व विख्यात कलाकार है |

यहां की वादन-शैली पखावज के बोलों को बंद करके बजाने की होने के कारण बाकी सभी घरानों से अलग है | यहाँ लयकारी का काम विशेष रूप से देखने को मिलता है|

उपरोक्त सभी घरानों को दो भागों में बांटा जा सकता है- पूरब तथा पश्चिम | पूरब बाज के अंतर्गत- लखनऊ घराना, बनारस घराना तथा फरुखाबाद घराना आता है और पश्चिम बाज के अंतर्गत दिल्ली घराना और अजराडा घराना आते है | पंजाब घराना स्वयं विकसित होने के कारण इन श्रेणीयों से अलग है |