ताल के १० प्राण(Hindi)

प्राचीन ग्रंथों में ताल के १० प्राणों का उल्लेख मिलता है | इन १० प्राणों को ताल के विषय में उतना ही महत्व दिया जाता है जितना कि मानव शरीर में वायु को | नारद रचित ग्रन्थ संगीत मकरंद में एक श्लोक इन १० प्राणों का वर्णन करता है –

कालो मार्गक्रियांगणि ग्रहोजाति: कला लय: ||

यति प्रस्तारक्श्चेति तालप्राणा दश स्मृता: ||

इस श्लोक का अर्थ है की काल, मार्ग, क्रिया, अंग, ग्रह, जाति, कला, लय, यति और प्रस्तार ताल के १० प्राण हैं | इनका उपयोग वर्तमान समय में पूरी तरह नहीं हो रहा है | समय के प्रवाह में इनकी जानकारी लुप्त होती जा रही है, परन्तु कुछ प्राणों का उपयोग अब भी होता है | आइये अब इनके विषय में चर्चा करें -

१.काल – इस पृथ्वी के आदि काल से वर्तमान तक का अखंडित समय काल है, जिसे  मनुष्य ने अपनी सुविधा के अनुसार सेकंड,मिनट,घंटा,दिन,सप्ताह,मास,वर्ष,युग,आदि में विभाजित किया हुआ है | संगीत में इस बीतते हुए समय का कोई अभिप्राय नहीं है संगीत में केवल वही समय काल के सन्दर्भ में देखा जायेगा जिसमे संगीत हो रहा हो | संगीत में काल से अभिप्राय वह समय है जिसमे गायन,वादन या नृत्य हो रहा हो | ताल रचना में भी काल सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है | प्राचीन विद्वानों ने माना है की यदि १०० कमल के पत्रों को एक साथ बांधकर उसमें सुई से छेद कर दें तो उसमे लगने वाला समय एक क्षण कहलाएगा | ठीक इसी प्रकार : ८ क्षण = १ लव ; ८ लव = १ काष्ठा ; ८ काष्ठा = १ निमेष ; ८ निमेष = १ कला ; २ कला = १ अणुद्रुत ; २ अणुद्रुत = १ द्रुत ; २ द्रुत = १ लघु ; २ लघु = १ गुरु ; ३ लघु = १ प्लुत ; ४ लघु = १ काकपद का निर्माण करते है |

विश्व प्रसिद्ध विद्वान डॉ. अरुण कुमार सेन जी ने अपनी पुस्तक भारतीय तालों का शास्त्रित विवेचन तथा पं. विजय शंकर मिश्र जी ने अपनी पुस्तकतबला पुराण में भी इसकी चर्चा बड़े विस्तार की है |

डॉ. मनोहर भालचंद्र मराठे जी ने अपनी पुस्तक ताल-वाद्य शास्त्र में लिखा है की ‘भरत’ के अनुसार पांच निमेष के काल को १ मात्रिक काल मान स्थापित किया गया है | साथ ही शारंगदेव रचित ग्रन्थ ‘संगीत-रत्नाकर’ के हवाले से कहा गया है कि पांच लघुअक्षरोच्चारण काल को एक मात्रा का काल माना गया है |

वर्तमान काल में काल की परिभाषा केवल एक मात्रा के काल के रूप में स्वीकार किया जाता है | यह एक मात्रा मध्य लय की एक मात्रा है जो कि एक सेकंड का समय लेती है |

२.मार्ग – इसका शाब्दिक अर्थ है - पथ या रास्ता | जिस प्रकार कोई राहगीर अपनी यात्रा आरम्भ से अंत तक कभी धीमी,कभी मध्यम और कभी तेज़ गति से पूरी करता है, ठीक उसी प्रकार संगीत में जब ताल अपनी प्रथम मात्रा से अंतिम मात्रा तक एक विशेष गति को धारण कर अपनी यात्रा पूर्ण करती है तो यह उसका मार्ग कहलाती है | वर्तमान समय में इसका प्रयोग नहीं होता परन्तु प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख निम्न प्रकार से मिलता है :-

क. ध्रुव मार्ग – यह एक मात्रा काल का है | इसमें तीन ताल को निम्न प्रकार से दर्शाएंगे:-

धा | धि | धि | धा | धा | धि | धि | धा | धा | ति | ति | ता | ता | धि | धि | धा

+     +    +     +    +     +    +    +     +    +     +    +    +    +     +    +

ख. चित्र मार्ग – यह दो मात्रा काल का है | इसमें प्रथम मात्रा पर ताली तथा दूसरी मात्रा पर खली होती है | इसमें तीन ताल को निम्न प्रकार से दर्शाएंगे:-

धा | धि | धि | धा | धा | धि | धि | धा | धा | ति | ति | ता | ता | धि | धि | धा

+     ०     +    ०     +    ०     +    ०     +     ०    +    ०    +     ०    +     ०

ग. वार्तिक मार्ग – यह चार मात्रा काल का है | इसमें प्रथम मात्रा पर ताली तथा शेष मात्रा पर खाली होती है | इसमें तीन ताल को निम्न प्रकार से दर्शाएंगे:-

धा  धि  धि  धा | धा  धि  धि  धा | धा  ति  ति  ता | ता  धि  धि  धा

+    ०    ०    ०    +    ०    ०   ०    +    ०    ०   ०    +    ०    ०   ०

घ. दक्षिण मार्ग - यह आठ मात्रा काल का है | इसमें प्रथम मात्रा पर ताली तथा शेष मात्रा पर खाली होती है | इसमें तीन ताल को निम्न प्रकार से दर्शाएंगे:-

धा  धि  धि  धा | धा  धि  धि  धा | धा  ति  ति  ता | ता  धि  धि  धा

+    ०    ०    ०    ०    ०    ०   ०    +    ०    ०   ०    ०    ०    ०    ०

 

१. सशब्द क्रिया – यह वह क्रिया है जब दोनों हाथों को संयुक्त कर ध्वनि उत्पन्न की जाती है | इसके चार भेद इस प्रकार हैं -३. क्रिया – क्रिया का शाब्दिक अर्थ है – किसी कार्य अथवा कर्म का होना | संगीत में इसे हाथों द्वारा ताल के विभाजन दर्शाते हुए ताली खाली का स्थान बताने वाली हस्त-क्रिया के रूप में किया जाता है | यह क्रिया दो प्रकार की होती है –

१. ध्रुवा – मध्यमा तथा अंगूठे से चुटकी बजाते हुए हाथ नीचे की दिशा में ले जाना |

२. शम्पा – दायें हाथ से बाएं हाथ पर ताली देने की क्रिया |

३. ताल - बाएं हाथ से दायें हाथ पर ताली देने की क्रिया |

४. सन्निपात – दोनों हाथों को एक साथ लाकर ताली देने की क्रिया |

२. नि:शब्द क्रिया – यह वह क्रिया है जिसमे हाथ को हवा में हिलाकर रिक्तता का भाव प्रदर्शित किया जाता है | इसके चार भेद इस प्रकार हैं –

१. आवाप – हाथों को ऊपर की दिशा में उठाकर उँगलियों को सिकोड़ना |

२. निष्काम – हाथ को नीचे की ओर लाकर उँगलियों को फैलाना |

३. विक्षेप – हाथ को फैलाकर दायीं ओर करना |

४. प्रवेक्षक - हाथ को सिकोड़कर बायीं ओर करना |

४. अंग – जिस प्रकार उत्तर भारतीय ताल पद्धति के अंतर्गत ताल के रूप को दर्शाने और अपनी सुविधा के लिए विभागों का निर्माण किया गया है | ठीक उसी प्रकार दक्षिण भारतीय ताल पद्धति में अंग का निर्माण किया गया है | दक्षिण भारतीय पद्धति में कुल ६ अंगों (अणुद्रुतम,द्रुतम,लघु,गुरु,प्लुतम,काकपद) का विवरण  दिया जाता है, परन्तु वर्तमान समय में केवल ३ (अणुद्रुतम,द्रुतम,लघु) का ही प्रयोग देखने को मिलता है | इन अंगों के नाम, चिन्ह तथा अक्षर-काल निम्न प्रकार से हैं –

अंग चिन्ह अक्षर-काल
१. अणुद्रुतम  U
२. द्रुतम O
३. लघु |
४. गुरु S
५. प्लुतम 8 १२
६. काकपद + १६

इन अंगों का प्रयोग केवल दक्षिण भारतीय ताल पद्धति में होता है | उत्तर भारतीय ताल पद्धति में इनका कोई विशेष प्रयोग नहीं होता |

५. ग्रह – इसका शाब्दिक अर्थ होता है – ग्रहण करना | संगीत में वह स्थान जहाँ से ताल गीत को ग्रहण करती है वह उसका ग्रह स्थान कहलाता है | गीत के ताल को ग्रहण करने का स्थान भिन्न हो सकता है, कभी गीत ताल की प्रथम मात्रा से आरम्भ होता है तो कभी किसी अन्य मात्रा से | इस प्रकार ग्रह के दो मुख्य प्रकार हैं – सम ग्रह और विषम गह | विषम ग्रह के भी दो भेद अतीत ग्रह तथा अनागत ग्रह हैं |

१.      सम ग्रह – गीत का आरंभ स्थान जब सम या पहली मात्रा से हो तो वह सम ग्रह कहलाता है |

गीत का आरंभ स्थान
ताल का आरंभ स्थान धा तिं तिं ता धिं धिं

२.      विषम ग्रह – गीत का आरंभ स्थान जब सम पर ना होकर किसी और मात्रा से हो तो वह विषम ग्रह कहलाता है | इसके दो भेद हैं –

१.      अतीत ग्रह – जब ताल का सम निकल जाने के बाद गीत आरंभ हो, उसे अतीत ग्रह कहते हैं |

गीत का आरंभ स्थान
ताल का आरंभ स्थान धिं धिं धा तिं तिं ता

 

  • अनागत ग्रह – जब ताल का सम आने से पूर्व गीत का आरम्भ हो, उसे अनागत ग्रह कहते हैं |
गीत का आरंभ स्थान
ताल का आरंभ स्थान तिं ता धिं धिं धा तिं

६. जाति – संगीत में ताल के लय प्रकारों को ही उसकी जाति माना जाता है | प्राचीन ग्रन्थ नाट्य शास्त्र तथा संगीत रत्नाकर के अनुसार ताल की केवल दो ही जातियां थीं – तिस्त्र तथा चतस्त्र | ६,१२,१८,२४ मात्राओं के तालों कोतिस्त्र जाति तथा ४,८,१६,३२ मात्राओं वाली तालों को चतस्त्र जाति की श्रेणी में सम्मिलित किया गया था | भारतीय संगीत में वर्तमान समय मे पांच जातियां हैं – तिस्त्र, चतस्त्र, खण्ड, मिश्र तथा संकीर्ण जाति, जोकि क्रमशः ३,४,५,७.९मात्रा खंड वाली तालों का प्रतिनिधित्व करती हैं | दादरा, एकताल, चारताल,आदि तिस्त्र जाति ; तीन ताल, तिलवाडा, कहरवा,आदि चतस्त्र जाति ; झपताल, सूल्ताल, आदि खण्ड जाति ; रूपक, तीवरा, आडा चौताल,आदि मिश्र जाति ; मतताल, आदि तालें संकीर्ण जाति के अंतर्गत आती हैं | दक्षिण भारतीय ताल पद्धति में जाति का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है | इस ताल पद्धति के अनुसार लघु के मात्रा-काल में बदलाव करके ताल की जाति बदली जा सकती है, इसी सिधांत के साथ उनकी प्रमुख ७ तालें ३५ तालों का रूप ले लेती हैं |

७.कला – कला को कई विभिन्न अर्थों में प्रयोग किया गया है | दक्षिण ताल पद्धति में कला को ‘विभाग’ के रूप में दर्शाया गया है | दक्षिण ताल पद्धति में कला को ३ रूपों में देखा जाता है – एक्कला, द्विकला, चतुश्कला |

१. एक्कला – जैसा कि इसके नाम से ही प्रतीत होता है कि वह बोल जिसमे प्रत्येक मात्रा पर एक-एक बोल आये | जैसे – धा, धि, ना, ति, गे, आदि |

२. द्विकला – इसके अंतर्गत वह बोल शामिल होते हैं जिनमे प्रत्येक मात्रा में दो-दो बोल आते हों | जैसे – तिट, धाती, तिना, कता, आदि |

३. चतुश्कला – इसके अंतर्गत वह बोल होते हैं जिनमे प्रत्येक मात्रा में चार-चार बोल आते हों | जैसे – तिटकिट, गदीगन, धाधातिट, आदि|

८. लय – संगीत(गायन,वादन,नृत्य) मे प्रयोग हो रही एकसमान गति को ही लय कहा जाता है | भारतीय संगीत के दो आधार स्तंभ लय और ताल हैं | लय के बिना संगीत में कुछ भी संभव नहीं है | सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही एक लयसूत्र मे बंधा हुआ है | लय के तीन भेद हैं – विलंबित लय, मध्य लय, द्रुत लय |

१. विलंबित लय – जब एक मात्रा से दूसरी मात्रा तक जाने में विलंभ हो तो वह गति विलंबित लय कहलाती है | इसका विश्रांति काल मध्य लय से दुगना कम होता है | ख़याल, ध्रुपद, धमार, मसीतखानी गत, आदि में इस लय का उपयोग होता है |

२. मध्य लय – जब मात्राओं का विलंभ ना बहुत अधिक हो और ना बहुत कम तो वह लय मध्य लय कहलाती है | वर्तमान समय में इसे एक सेकंड का काल माना जाता है | छोटा ख्याल, सितारखानी गत, मध्य लय की गायन बंदिश, आदि इस लय का प्रयोग करते हैं |

३. द्रुत लय – जब लय अपनी सामान्य लय या मध्य लय से दुगनी तीव्र हो तो वह द्रुत लय कहलाती है | इस लय में तराना, रेला, रौ, गायन बंदिश का समापन, आदि का प्रयोग होता है |

९. यति – संगीत में गति के भेद को ही यति माना गया है | तबले की बंदिश भी किसी न किसी लय में बंधी होती है | यदि एक दीर्घ मात्राकाल की बंदिश एक ही लय में प्रस्तुत की जाये तो वह अपना आकर्षण खो बैठती है | इसी विचार को धारण कर बंदिश की गति में भेद उत्पन्न किया जाता है | साधारण शब्दों में लय की गति की विभिन्न प्रस्तुतियों को यति के नाम से जाना जाता है | इसके पांच भेद है – समायति, स्र्तोतोगता यति, गोपुच्छा यति, म्रदुंगा यति, पिपिलिका यति |

१. समायति – जब बंदिश के बोलो का विश्रांतिकाल एक समान हो अथवा गति में बदलाव न हो तो ऐसी बंदिश को समायति का उदाहरण मानेगे |

२. स्र्तोतोगता यति – जिस प्रकार नदी के आरम्भ स्थान पर जल का प्रवाह धीमा होता है तथा नदी के आगे बढ़ने के साथ साथ जल का प्रवाह भी तेज होता जाता है | ठीक उसी प्रकार जब कोई बंदिश विलंबित से द्रुत लय की और बढती हुई सम को प्राप्त होती है तो वह स्र्तोतोगता यति कहलाती है |

३. गोपुच्छा यति – जब कोई बंदिश प्रारंभ में द्रुत लय को धारण कर आरम्भ हो और अपने मध्य काल में मध्य लय को धारण करे और अंतिम पड़ाव पर विलंबित लय धारण करते हुए सम को प्राप्त हो तो उसे गोपुच्छा यति कहते हैं |

४. म्रदुंगा यति – इसके विषय में दो मत प्रचलित हैं | पहला यह कि जब कोई बंदिश आरम्भ में मध्य लय अपने मध्यकाल में विलंबित लय तथा अंत में द्रुत लय धारण कर सम को प्राप्त करे और दुसरे मत के अनुसार तीन प्रकार की बंदिशों को इसके साथ जोड़ा गया है –

अ. आरंभ और अंत में मध्य लय तथा मध्य में विलंबित लय |

ब. आरंभ और अंत में द्रुत लय तथा मध्य में विलंबित लय |

स. आरंभ और अंत में द्रुत लय तथा मध्य में मध्य लय |

५. पिपिलिका यति / डमरू यति – इसका आधार डमरू और चींटी जीव के आकार पर आधारित है | इसका प्रारूप इस प्रकार है –

अ. आरम्भ में मध्य लय, मध्यकाल में द्रुत लय तथा अंत में मध्य लय |

ब. आरम्भ में विलंबित लय, मध्यकाल में मध्य लय तथा अंत में विलंबित लय |

स. आरम्भ में विलंबित लय, मध्य काल में द्रुत लय तथा अंत में विलंबित लय |

 

१०. प्रस्तार – इसका मूल अर्थ है – विस्तार | जिस प्रकार हम पेशकार,कायदा,रेला आदि का विस्तार पलटों के द्वारा करते हैं, इसी क्रिया को प्रस्तार कहते हैं | इसके अतिरिक्त गायन में भी जब राग का रूप दर्शाने के लिए कलाकार राग का विस्तार आलाप, तान, आदि का प्रयोग करते हैं तो वह क्रिया भी प्रस्तार ही कहलाती है | प्रस्तार क्रिया से संगीत में एक स्रजनता, नवीनता तथा आश्चर्य की अनुभूति होती रहती है | प्रस्तार तथा विस्तार एक ही सिक्के के दो पहलु हैं | इनकी उपस्थिति ही संगीत में नवजीवन की उपार्जना है |